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कर्त्तव्य का पाठ [प्रेरक प्रसंग ]

कर्त्तव्य का पाठ [प्रेरक प्रसंग ]


जाजलि श्रद्धापूर्वक वानप्रस्थ धर्म का पालन करने के बाद खडे़ होकर कठोर तपस्या करने लगे।उन्हें गतिहीन देखकर पक्षियों ने उन्हें कोई वृक्ष समझ लिया और उनकी जटाओं में घोंसले बनाकर अंडे दे दिए।

अंडे बढे़ और फूटे, उनसे बच्चे निकले। बच्चे बड़े हुए और उड़ने भी लगे। एक बार जब बच्चे उड़कर पूरे एक महीने तक अपने घोंसले में नहीं लौटे, तब जाजलि हिले।

वह स्वयं अपनी तपस्या पर आश्चर्य करने लगे और अपने को सिद्ध समझने लगे। उसी समय आकाशवाणी हुई, 'जाजलि, गर्व मत करो। काशी में रहने वाले व्यापारी तुलाधार के समान तुम धार्मिक नहीं हो।'

आकाशवाणी सुनकर जाजलि को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह उसी समय काशी चल पड़े। उन्होंने देखा कि तुलाधार तो एक अत्यंत साधारण दुकानदार हैं। वह अपनी दुकान पर बैठकर ग्राहकों को तौल-तौलकर सौदा दे रहे थे।

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जाजलि को तब और भी आश्चर्य हुआ जब तुलाधार ने उन्हें उठकर प्रणाम किया, उनकी तपस्या, उनके गर्व तथा आकाशवाणी की बात भी बता दी। जाजलि ने पूछा, 'तुम्हें यह सब कैसे मालूम?' तुलाधार ने विनम्रतापूर्वक कहा, 'सब प्रभु की कृपा है। मैं अपने कर्त्तव्य का सावधानी से पालन करता हूं। न मद्य बेचता हूं, न और कोई निंदित पदार्थ। अपने ग्राहकों को मैं तौल में कभी ठगता नहीं। ग्राहक बूढ़ा हो या बच्चा, वह भाव जानता हो या न जानता हो, मैं उसे उचित मूल्य पर उचित वस्तु ही देता हूं। किसी पदार्थ में दूसरा कोई दूषित पदार्थ नहीं मिलाता। ग्राहक की कठिनाई का लाभ उठाकर मैं अनुचित लाभ भी उससे नहीं लेता हूं। ग्राहक की सेवा करना मेरा कर्त्तव्य है, यह बात मैं सदा स्मरण रखता हूं। मैं राग-द्वेष और लोभ से दूर रहता हूं। यथाशक्ति दान करता हूं और अतिथियों की सेवा करता हूं। हिंसारहित कर्म ही मुझे प्रिय है। कामना का त्याग करके संतोषपूर्वक जीता हूं।'

जाजलि समझ गए कि आखिर क्यों उन्हें तुलाधार के पास भेजा गया। उन्होंने तुलाधार की बातों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प किया।
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प्रेरक प्रसंग - बुढ़िया की सीख

प्रेरक प्रसंग

                         
                          *बुढ़िया की सीख

                  बात उन दिनों की है, जिन दिनों छत्रपति शिवाजी मुगलों  के विरुद्ध छापा मार युद्ध लड़ रहे थे। एक दिन रात को वे थके- मांदे एक वनवासी बुढ़िया की झोंपड़ी में पहुंचे। उन्होंने कुछ खाने के लिए मांगा। बुढ़िया के घर में केवल चावल थे, सो उसने प्रेम पूर्वक भात पकाया और उसे ही परोस दिया। शिवाजी बहुत भूखे थे, सो झट से भात खाने की आतुरता में उंगलियां जला बैठे। हाथ की जलन शांत करने के लिए फूंकने लगे। यह देख बुढ़िया ने उनके चेहरे की ओर गौर से देखा और बोली-सिपाही तेरी सूरत शिवाजी जैसी लगती है और साथ ही यह भी लगता है कि तू उसी की तरह मूर्ख है। 
                    शिवाजी स्तब्ध रह गए। उन्होंने बुढ़िया से पूछा- भला शिवाजी की मूर्खता तो बताओ और साथ ही मेरी भी। बुढ़िया ने उत्तर दिया- तूने किनारे- किनारे से थोड़ा- थोड़ा ठंडा भात खाने की अपेक्षा बीच के सारे भात में हाथ डाला और उंगलियां जला लीं। यही मूर्खता शिवाजी करता है। वह दूर किनारों पर बसे छोटे- छोटे किलों को आसानी से जीतते हुए शक्ति बढ़ाने की अपेक्षा बड़े किलों पर धावा बोलता है और हार जाता है।

                     शिवाजी को अपनी रणनीति की विफलता का कारण पता चल गया। उन्होंने बुढ़िया की सीख मानी और पहले छोटे लक्ष्य बनाए और उन्हें पूरा करने की रीति- नीति अपनाई। इस प्रकार उनकी शक्ति बढ़ी और अंततः वे बड़ी विजय पाने में समर्थ हुए। शुभारंभ हमेशा छोटे- छोटे संकल्पों से होता है, तभी बड़े संकल्पों को पूरा करने का आत्मविश्वास जागृत होता है।

         *शिक्षा   -      इस कहानी से यह ज्ञान मिलता है कि पहले छोटे लक्ष्य बनाएं और फिर बड़े लक्ष्य के बारे में सोचें। ऐसा करने से सफलता जरूर मिलेगी, क्योंकि छोटा लक्ष्य प्राप्त करने पर बड़े लक्ष्य को पाने की ऊर्जा दोगुनी हो जाती है।*


    【  A R J GURU EDUCATION NEWS  】

एक दिन नयी सोच

*आज का प्रेरक प्रसंग*


 *एक दिन नयी सोच*


एक नदी के किनारे दो पेड़ थे.....


उस रास्ते एक छोटी सी चिड़िया गुजरी और.....

पहले पेड़ से पूछा.. बारिश होने वाला है, क्या मैं और मेरे बच्चे तुम्हारे टहनी में घोसला बनाकर रह सकते हैं..
लेकिन वो पेड़ ने मना कर दिया....

चिड़िया फिर दूसरे पेड़ के पास गई और वही सवाल पूछा दूसरा पेड़ मान गया,

चिड़िया अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी दूसरे पेड़ में घोसला बना कर रहने लगी,
एक दिन इतनी अधिक बारिश हुई कि इसी दौरान पहला पेड़ जड़ से उखड़ कर पानी मे बह गया.

जब चिड़िया ने उस पेड़ को बहते हुए देखा तो कहा...

जब तुमसे मैं और मेरे बच्चे शरण के लिये आई तब तुमने मना कर दिया था, *अब देखो तुम्हारे उसी रूखी बर्ताव की सजा तुम्हे मिल रही है*

जिसका उत्तर पेड़ ने मुस्कुराते हुए दिया *मैं जानता था मेरी जड़ें कमजोर है* और इस बारिश में टिक नहीं पाऊंगा, मैं तुम्हारी और बच्चे की  जान खतरे में नहीं डालना चाहता था, मना करने के लिए मुझे क्षमा कर दो, और ये कहते-कहते पेड़ बह गया..


*किसी के इंकार को हमेशा उनकी कठोरता न समझे*


क्या पता उसके उसी इंकार से आप का भला हो,

कौन किस परिस्थिति में है शायद हम नहीं समझ पाए।

इसलिए किसी के चरित्र और शैली को उनके वर्तमान व्यवहार से ना तौले

    


         【 A R J EDUCATION NEWS 】


प्रेरक प्रसंग :-  गन्ने जैसा राजा

प्रेरक प्रसंग

      गन्ने जैसा राजा

राजा कृष्णदेव राय का तेनालीराम के प्रति लगाव दरबारियों से छुपा नहीं थी। ईर्ष्या के मारे कुछ दरबारियों की रातों की नींद और दिन का चैन हराम हो गये थे। किस प्रकार राजा को राजविदूषक से दूर करें, यही वे हर पल सोचते रहते थे।

एक रोज उन सभी ईष्र्यालु दरबारियों ने मिलकर राजा कृष्णदेव राय से फरियाद की, महाराज, आप जब भी दौरे पर जाते हैं, तो तेनालीराम को अपने साथ ले जाते हैं। एक बार हमें भी तो मौका देकर देखिए।

राजा ने उनकी बात मान ली और अगली बार उन्हें मौका देने का वादा किया।*

कुछ दिन बाद राजा को कुछ गाँवों में वेश बदल कर जाना था। इस बार तेनालीराम को साथ न ले जाकर राजा ने उन ईष्र्यालु दरबारियों में से दो को साथ ले लिया।

राजा और दोनों दरबारी ग्रामीण वेश में थे। काफी चलने के बाद वे एक गाँव में पहुँचे। वहाँ खेतों में बैठ कर कुछ किसान बातचीत कर रहे थे। उन तीनों ने वहाँ पहुँच कर उन किसानों से पीने का पानी माँगा।

जब किसान उन्हें पानी पिला रहे थे, तब मौका पाकर राजा ने उनसे पूछा, "क्यों भाइयों! आपके गाँव में सब ठीक प्रकार से है न? आपको राजा कृष्णदेव राय से कोई शिकायत तो नहीं है?"

इस प्रकार के प्रश्न सुनकर गाँव वाले थोड़ा चैकन्ने हो गये। उन्हें लगा कि ये तीनों राजा के अधिकारी हैं। चैकस होकर उन्होंने जवाब दिया, "नहीं भाई! हमारे गाँव में हर ओर शान्ति और समृद्धी हैं। सब लोग खुश हैं। वे दिन भर काम करते हैं और रात को चैन की नींद सोते हैं। किसी को कोई परेशानी नहीं है। महाराज तो अपनी प्रजा को अपने बच्चों की तरह मानते हैं, तो फिर परेशानी या शिकायत कैसी?"

गाँव के लोग राजा के बारे में क्या सोचते हैं?" राजा कृष्णदेव राय ने फिर पूछा।

इस बार एक बूढ़ा किसान आगे आया और पास के खेत से एक गन्ना उखाड़ कर राजा के पास आया और बोला, "हुजूर! हमारे महाराज इस गन्ने की तरह हैं।"

राजा अपनी तुलना गन्ने से होता देखकर हक्के-बक्के रह गये। न तो उन्हें बूढ़े किसान की बात का मतलब समझ में आया, न वे पूरी तरह गाँव वाले की अपने बारे में राय जान पाये।

राजा ने अपने साथ आये दोनों दरबारियों से बूढ़े किसान की बात का अर्थ स्पष्ट करने को कहा, तो उन दोनों में से एक दरबारी बोला, "हुजूर! मेरे विचार में यह बूढ़ा किसान कहना चाहता है कि हमारे महाराज इस गन्ने की तरह कमजोर हैं। जैसे इसके एक ही झटके में गन्ने को जड़ से उखाड़ फेंका जा सकता है।" राजा कृष्णदेव राय कुछ क्षणों तक दरबारी की इस व्याख्या पर विचार करते रहे। फिर वे क्रोध से लाल हो गये और उस बूढ़े किसान से चिल्ला कर बोले, तुम मुझे पहचानते नहीं हो कि मैं कौन हूँ?

राजा के क्रोध भरे शब्दों को सुनकर बूढ़ा किसान थर-थर काँपने लगा। तभी पास की एक झोपड़ी से एक दाढ़ी वाला किसान चादर ओढ़े निकल कर आया और नम्रतापूर्वक बोला, "हुजूर! मैं तो आपको देखते ही पहचान गया था, परन्तु क्षमा चाहता हूँ कि मेरा यह साथी, महाराज को गन्ने की भाँति नरम और मीठा बता रहा है। साथ ही वह कह रहा है कि चोरों, बदमाशों और दुश्मनों के लिए वे कड़क हैं और उन्हें अच्छी प्रकार सजा देते हैं।" इस तरह....यह कहते हुए उस बूढ़े आदमी ने पास खड़े एक आवारा कुत्ते को गन्ना दे मारा। काँय.....काँय... करता हुआ कुत्ता वहाँ से भाग गया। तभी दाढ़ी मुँह से हटा दी। राजा के साथ आये दोनों दरबारी आश्चर्य से एक साथ बोल उठे, "तेनाली! तुम हमारा पीछे कर रहे थे?"

तेनालीराम ने मुस्करा कर कहा, मैं आपको महाराज के साथ अकेले कैसे छोड़ सकता था। अगर मैंने आपका पीछा न किया होता, तो आपने तो इन निर्दोष किसानों को फाँसी पर चढ़वा दिया होता। आपकी बातों से हमारे शान्तिप्रिय महाराज का क्रोध जाग उठा था। इन निर्दोष किसानों की बातों का ऐसा उल्टा अर्थ आपने लगाया भी कैसे?

*अब राजा कृष्णदेव बोले, "सही कहते हो, तेनाली! मूर्खों के साथ विहार करना नुकसानदायक सिद्ध होता है। भविष्य में मैं ऐसा कभी नहीं करूँगा।"*

*जब गाँव वालों को राजा कृष्णदेव राय के वहाँ पधारने की खबर मिली, तो उन्होंने एक बड़ा आयोजन किया और उन सबका जमकर स्वागत किया।*

*राजा कृष्णदेव राय गाँव वालों के प्रेम को देखr कर भाव-विभोर हो उठे। तेनाली की बातों से चिढ़े दरबारी पूरे आयोजन के दौरान एक कोने में बैठे रहे और तेनाली महाराज के साथ बैठ कर बढ़िया भोजन और नाच गाने का आनन्द लेता रहा।*

*शिक्षा (Tenali's Moral): कई बार सच्चाई उगलवाने के लिए वेश बदलने की आवश्यकता पड़ती है। आपके रूतबे से डरकर लोग आपके मुँह पर आपको पसन्द आने वाली बातें करते हैं, परन्तु सच्चाई तब सामने आती है, जब आप अपने वास्तविक रूप को एक आवरण से ढक लेते हैं।*

रहस्य जीवन का

*आज का प्रेरक प्रसंग*

*रहस्य जीवन का*

          एक औरत बहुत महँगे कपड़े में अपने मनोचिकित्सक के पास गई और बोली "डॉ साहब!मुझे लगता है कि मेरा पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। क्या आप मेरी खुशियाँ ढूँढने में मदद करेंगें?"
           मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं मैरी से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"
          तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।"
            मैं खुद का जीवन लेने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन,एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।"
               "उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई। तब मैंने सोचा यदि इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करना मुझे ख़ुशी दे सकता है,तो हो सकता है दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था,के लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।"
          "हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी।" 
            "आज,मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।"
                यह सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी।
             लेकिन उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।  
           मित्रों! हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।
        तो आईये आज शुभारम्भ करें इस संकल्प के साथ कि आज हम भी किसी न किसी की खुशी का कारण बनें।

प्रेरक प्रसंग - जब भिखारी बना दाता और राजा बना याचक

[प्रेरक प्रसंग]

जब भिखारी बना दाता और राजा बना याचक

एक भिखारी भीख मांगने निकला। उसका सोचना था कि जो कुछ भी मिल जाए, उस पर अधिकार कर लेना चाहिए। एक दिन वह राजपथ पर बढ़ा जा रहा था। एक घर से उसे कुछ अनाज मिला। वह आगे बढ़ा और मुख्य मार्ग पर आ गया।

अचानक उसने देखा कि नगर का राजा रथ पर सवार होकर उस ओर आ रहा है। वह सवारी देखने के लिए खड़ा हो गया, लेकिन यह क्या? राजा की सवारी उसके पास आकर रुक गई। राजा रथ से उतरा और भिखारी के सामने हाथ पसारकर बोला- मुझे कुछ भीख दो। देश पर संकट आने वाला है और पंडितों ने बताया है कि आज मार्ग में जो पहला भिखारी मिले, उससे भीख मांगें तो संकट टल जाएगा। इसलिए मना मत करना। भिखारी हक्का-बक्का रह गया। राजा, देश के संकट को टालने के लिए उससे भीख मांग रहा है। भिखारी ने झोली में हाथ डाला, तो उसकी मुट्ठी अनाज से भर गई। उसने सोचा इतना नहीं दूंगा। उसने मुट्ठी थोड़ी ढीली की और अनाज के कुछ दाने भरे। किंतु फिर सोचा कि इतना भी दूंगा तो मेरा क्या होगा? भिखारी घर पहुंचकर पत्नी से बोला- आज तो अनर्थ हो गया। मुझे भीख देनी पड़ी। पर न देता तो क्या करता। पत्नी ने झोली को उल्टा किया तो उसमें एक सोने का सिक्का निकला। यह देखकर भिखारी पछताकर बोला- मैंने राजा को सभी कुछ क्यों न दिया? यदि मैंने ऐसा किया होता तो आज मेरी जीवनभर की गरीबी मिट जाती।

इस प्रतीकात्मक कथा का संकेत यह है कि दान देने से संपन्नता हजार गुना बढ़ती है। यदि हम हृदय की सारी उदारता से दान करें, तो प्रतिफल में दीर्घ लाभ की प्राप्ति होती है।

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प्रेरक प्रसंग किनारे बैठकर स्वीकारी उसने लहरों की चुनौती

[दिनांक 05 दिसम्बर का प्रेरक प्रसंग ]

किनारे बैठकर स्वीकारी उसने लहरों की चुनौती

एक व्यक्ति नित्य ही समुद्र तट पर जाता और वहां घंटों बैठा रहता। आती-जाती लहरों को निरंतर देखता रहता। बीच-बीच में वह कुछ उठाकर समुद्र में फेंकता, फिर आकर अपने स्थान पर बैठ जाता। तट पर आने वाले लोग उसे विक्षिप्त समझते और प्राय: उसका उपहास किया करते थे। कोई उसे ताने कसता तो कोई अपशब्द कहता, किंतु वह मौन रहता और अपना यह प्रतिदिन का क्रम नहीं छोड़ता। एक दिन वह समुद्र तट पर खड़ा तरंगों को देख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने समुद्र में कुछ फेंकना शुरू किया। उसकी इस गतिविधि को एक यात्री ने देखा। पहले तो उसने भी यही समझा कि यह मानसिक रूप से बीमार है, फिर उसके मन में आया कि इससे चलकर पूछें तो। वह व्यक्ति के निकट आकर बोला- भाई! यह तुम क्या कर रहे हो? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- देखते नहीं, सागर बार-बार अपनी लहरों को आदेश देता है कि वे इन नन्हे शंखों, घोंघों और मछलियों को जमीन पर पटककर मार दें। मैं इन्हें फिर से पानी में डाल देता हूं। यात्री बोला- यह क्रम तो चलता ही रहता है। लहरें उठती हैं, गिरती हैं, ऐसे में कुछ जीव तो बाहर होंगे ही। तुम्हारी इस चिंता से क्या अंतर पड़ेगा? उस व्यक्ति ने एक मुट्ठी शंख-घोंघों को अपनी अंजुली में उठाया और पानी में फेंकते हुए कहा- देखा कि नहीं, इनके जीवन में तो फर्क पड़ गया? वह यात्री सिर झुकाकर चलता बना और वह व्यक्ति वैसा ही करता रहा। सार यह है कि अच्छे कार्य का एक लघु प्रयास भी महत्वपूर्ण होता है। जैसे बूंद-बूंद से घट भरता है, वैसे ही नन्हे प्रयत्नों की श्रंखला से सत्कार्य को गति मिलती है। अत: बाधाओं की परवाह किए बगैर प्रयास करना न छोड़ें।

एक व्यक्ति नित्य ही समुद्र तट पर जाता और वहां घंटों बैठा रहता। आती-जाती लहरों को निरंतर देखता रहता। बीच-बीच में वह कुछ उठाकर समुद्र में फेंकता, फिर आकर अपने स्थान पर बैठ जाता। तट पर आने वाले लोग उसे विक्षिप्त समझते और प्राय: उसका उपहास किया करते थे। कोई उसे ताने कसता तो कोई अपशब्द कहता, किंतु वह मौन रहता और अपना यह प्रतिदिन का क्रम नहीं छोड़ता। एक दिन वह समुद्र तट पर खड़ा तरंगों को देख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने समुद्र में कुछ फेंकना शुरू किया। उसकी इस गतिविधि को एक यात्री ने देखा। पहले तो उसने भी यही समझा कि यह मानसिक रूप से बीमार है, फिर उसके मन में आया कि इससे चलकर पूछें तो। वह व्यक्ति के निकट आकर बोला- भाई! यह तुम क्या कर रहे हो? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- देखते नहीं, सागर बार-बार अपनी लहरों को आदेश देता है कि वे इन नन्हे शंखों, घोंघों और मछलियों को जमीन पर पटककर मार दें। मैं इन्हें फिर से पानी में डाल देता हूं। यात्री बोला- यह क्रम तो चलता ही रहता है। लहरें उठती हैं, गिरती हैं, ऐसे में कुछ जीव तो बाहर होंगे ही। तुम्हारी इस चिंता से क्या अंतर पड़ेगा? उस व्यक्ति ने एक मुट्ठी शंख-घोंघों को अपनी अंजुली में उठाया और पानी में फेंकते हुए कहा- देखा कि नहीं, इनके जीवन में तो फर्क पड़ गया? वह यात्री सिर झुकाकर चलता बना और वह व्यक्ति वैसा ही करता रहा। सार यह है कि अच्छे कार्य का एक लघु प्रयास भी महत्वपूर्ण होता है। जैसे बूंद-बूंद से घट भरता है, वैसे ही नन्हे प्रयत्नों की श्रंखला से सत्कार्य को गति मिलती है। अत: बाधाओं की परवाह किए बगैर प्रयास करना न छोड़ें।

एक व्यक्ति नित्य ही समुद्र तट पर जाता और वहां घंटों बैठा रहता। आती-जाती लहरों को निरंतर देखता रहता। बीच-बीच में वह कुछ उठाकर समुद्र में फेंकता, फिर आकर अपने स्थान पर बैठ जाता। तट पर आने वाले लोग उसे विक्षिप्त समझते और प्राय: उसका उपहास किया करते थे। कोई उसे ताने कसता तो कोई अपशब्द कहता, किंतु वह मौन रहता और अपना यह प्रतिदिन का क्रम नहीं छोड़ता। एक दिन वह समुद्र तट पर खड़ा तरंगों को देख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने समुद्र में कुछ फेंकना शुरू किया। उसकी इस गतिविधि को एक यात्री ने देखा। पहले तो उसने भी यही समझा कि यह मानसिक रूप से बीमार है, फिर उसके मन में आया कि इससे चलकर पूछें तो। वह व्यक्ति के निकट आकर बोला- भाई! यह तुम क्या कर रहे हो? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- देखते नहीं, सागर बार-बार अपनी लहरों को आदेश देता है कि वे इन नन्हे शंखों, घोंघों और मछलियों को जमीन पर पटककर मार दें। मैं इन्हें फिर से पानी में डाल देता हूं। यात्री बोला- यह क्रम तो चलता ही रहता है। लहरें उठती हैं, गिरती हैं, ऐसे में कुछ जीव तो बाहर होंगे ही। तुम्हारी इस चिंता से क्या अंतर पड़ेगा? उस व्यक्ति ने एक मुट्ठी शंख-घोंघों को अपनी अंजुली में उठाया और पानी में फेंकते हुए कहा- देखा कि नहीं, इनके जीवन में तो फर्क पड़ गया? वह यात्री सिर झुकाकर चलता बना और वह व्यक्ति वैसा ही करता रहा। सार यह है कि अच्छे कार्य का एक लघु प्रयास भी महत्वपूर्ण होता है। जैसे बूंद-बूंद से घट भरता है, वैसे ही नन्हे प्रयत्नों की श्रंखला से सत्कार्य को गति मिलती है। अत: बाधाओं की परवाह किए बगैर प्रयास करना न छोड़ें।

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प्रेरक प्रसंग - ज्ञान का अर्थ

*आज का प्रेरक प्रसंग*

*ज्ञान का अर्थ*

रामकृष्ण परमहंस ने अपने शिष्यों से वार्तालाप में एक बार बताया कि-
ईश्वर द्वारा बनायी गयी इस सृष्टि के कण-कण में परमेश्वर का वास है। अत: प्रत्येक जीव के लिए हमें अपने मन में आदर एवं प्रेम का भाव रखना चाहिए।“

एक शिष्य ने इस बात को मन में बैठा लिया। कुछ दिन बाद वह कहीं जा रहा था। उसने देखा कि सामने से एक हाथी आ रहा है।
हाथी पर बैठा महावत चिल्ला रहा था-
“सामने से हट जाओ, हाथी पागल है। वह मेरे काबू में भी नहीं है।“

शिष्य ने यह बात सुनी; पर उसने सोचा कि
“गुरुजी ने कहा था कि सृष्टि के कण-कण में परमेश्वर का वास है। अत: इस हाथी में भी परमेश्वर होगा। फिर वह मुझे हानि कैसे पहुँचा सकता है?” 

यह सोचकर उसने महावत की चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया। जब वह हाथी के निकट आया, तो परमेश्वर का रूप मानकर उसने हाथी को साष्टांग प्रणाम किया। इससे हाथी भड़क गया। उसने शिष्य को सूंड में लपेटा और दूर फेंक दिया। शिष्य को बहुत चोट आयी।

वह कराहता हुआ रामकृष्ण परमहंस के पास आया और बोला-
“आपने जो बताया था, वह सच नहीं है। यदि मुझमें भी वही ईश्वर है, जो हाथी में है, तो उसने मुझे फेंक क्यों दिया?”

परमहंस जी ने हँस कर पूछा-
“क्या हाथी अकेला था?”

शिष्य ने कहा-
“नहीं, उस पर महावत बैठा चिल्ला रहा था कि हाथी पागल है। उसके पास मत आओ।“

इस पर परमहंस जी ने कहा-
“पगले, हाथी परमेश्वर का रूप था, तो उस पर बैठा महावत भी तो उसी का रूप था। तुमने महावत रूपी परमेश्वर की बात नहीं मानी, इसलिए तुम्हें हानि उठानी पड़ी।“

कथा का अभिप्राय यह है कि....
प्रत्येक धारणा को, उसमें निहित विचार को विवेक बुद्धि से ग्रहण करना चाहिए। भक्ति या आदर भाव से ज्यों का त्यों पकड़ना, सरलता नहीं, मूढ़ता है।
बेशक! विचार-विलास भरी वक्रता न हो, स्थितप्रज्ञ सम जड़ता भी किसी काम की नहीं है।
वस्तुतः उस ज्ञान का कोई अर्थ नहीं, जिसके साथ बुध्दि, विवेक, सजगता और सावधानी न हो।

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ज्ञान का अर्थ [प्रेरक प्रसंग] रामकृष्ण परमहंस एवं शिष्य

रामकृष्ण परमहंस ने अपने शिष्यों से वार्तालाप में एक बार बताया कि-
“ईश्वर द्वारा बनायी गयी इस सृष्टि के कण-कण में परमेश्वर का वास है। अत: प्रत्येक जीव के लिए हमें अपने मन में आदर एवं प्रेम का भाव रखना चाहिए।“

एक शिष्य ने इस बात को मन में बैठा लिया। कुछ दिन बाद वह कहीं जा रहा था। उसने देखा कि सामने से एक हाथी आ रहा है।
हाथी पर बैठा महावत चिल्ला रहा था-
“सामने से हट जाओ, हाथी पागल है। वह मेरे काबू में भी नहीं है।“

शिष्य ने यह बात सुनी; पर उसने सोचा कि
“गुरुजी ने कहा था कि सृष्टि के कण-कण में परमेश्वर का वास है। अत: इस हाथी में भी परमेश्वर होगा। फिर वह मुझे हानि कैसे पहुँचा सकता है?” 

यह सोचकर उसने महावत की चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया। जब वह हाथी के निकट आया, तो परमेश्वर का रूप मानकर उसने हाथी को साष्टांग प्रणाम किया। इससे हाथी भड़क गया। उसने शिष्य को सूंड में लपेटा और दूर फेंक दिया। शिष्य को बहुत चोट आयी।

वह कराहता हुआ रामकृष्ण परमहंस के पास आया और बोला-
“आपने जो बताया था, वह सच नहीं है। यदि मुझमें भी वही ईश्वर है, जो हाथी में है, तो उसने मुझे फेंक क्यों दिया?”

परमहंस जी ने हँस कर पूछा-
“क्या हाथी अकेला था?”

शिष्य ने कहा-
“नहीं, उस पर महावत बैठा चिल्ला रहा था कि हाथी पागल है। उसके पास मत आओ।“

इस पर परमहंस जी ने कहा-
“पगले, हाथी परमेश्वर का रूप था, तो उस पर बैठा महावत भी तो उसी का रूप था। तुमने महावत रूपी परमेश्वर की बात नहीं मानी, इसलिए तुम्हें हानि उठानी पड़ी।“

कथा का अभिप्राय यह है कि....
प्रत्येक धारणा को, उसमें निहित विचार को विवेक बुद्धि से ग्रहण करना चाहिए। भक्ति या आदर भाव से ज्यों का त्यों पकड़ना, सरलता नहीं, मूढ़ता है।
बेशक! विचार-विलास भरी वक्रता न हो, स्थितप्रज्ञ सम जड़ता भी किसी काम की नहीं है।
वस्तुतः उस ज्ञान का कोई अर्थ नहीं, जिसके साथ बुध्दि, विवेक, सजगता और सावधानी न हो।